Home Biography कबीर दास जी का जीवन परिचय -Kabir Das Ji Ka Jivan Parichay

कबीर दास जी का जीवन परिचय -Kabir Das Ji Ka Jivan Parichay

कबीर दास जी का जीवन परिचय - ( Kabir Das Ji Ka Jivan Parichay in Hindi)

कबीर दास जी का जीवन परिचय – ( Kabir Das Ji Ka Jivan Parichay in Hindi)

कबीर दास का जीवन परिचय – कबीर दास जी भारत के एक महान कवि और संत रहे हैं। वे हिन्दी साहित्य के निपुण विद्वान और भक्ति काल के महान प्रवर्तक रहे हैं। उनके दोहे और कविताएँ लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं।

उनके लेखन को सिख ग्रंथों आदि में भी देखा जा सकता है। कबीर दास जी किसी एक धर्म के प्रवर्तक नहीं थे। वे सिर्फ भगवान में विश्वास करते थे। उनके लिए सर्वोच्च ईश्वर से बढ़कर कोई नहीं था।

कबीर दास जी का जन्म काशी में हुआ था। उन्होंने समाज में फैले धार्मिक कुरुतियों की कड़ी निंदा की और लोगों को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। 

पिछले लेख में, हमने महत्वपूर्ण विषय  Dr. APJ अब्दुल कलाम का इतिहास व जीवन परिचय और स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekanand) का जीवन परिचय – Biography के बारे में अच्छे से और सम्पूर्ण जानकारी प्रदान कर चुके हैं।

कबीर दास जी ने अपनी कृतियों में हिन्दी, पंजाबी, हरियाणवी, काल, ब्रज, खड़ी बोली और राजस्थानी भाषा का सम्मिश्रण किया है। उनका प्रभाव सिख, मुस्लिम, हिंदू तीनों धर्मों में देखा जाता है। उनके बारे में सारी जानकारी इस लेख के माध्यम से प्रदान की गई है। आप नीचे दिए गए अनुभाग में पढ़ सकते हैं।

कबीर दास का जीवन परिचय – कबीर दास जी भारत के एक महान कवि और संत रहे हैं। वे हिन्दी साहित्य के निपुण विद्वान और भक्ति काल के महान प्रवर्तक रहे हैं। 

उनके दोहे और कविताएँ लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। उनके लेखन को सिख ग्रंथों आदि में भी देखा जा सकता है। कबीर दास जी किसी एक धर्म के प्रवर्तक नहीं थे। वे सिर्फ भगवान में विश्वास करते थे। उनके लिए सर्वोच्च ईश्वर से बढ़कर कोई नहीं था।

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कबीर दास जी का जन्म काशी में हुआ था। उन्होंने समाज में फैले धार्मिक कुरुतियों की कड़ी निंदा की और लोगों को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। 

कबीर दास जी ने अपनी कृतियों में हिन्दी, पंजाबी, हरियाणवी, काल, ब्रज, खड़ी बोली और राजस्थानी भाषा का सम्मिश्रण किया है। उनका प्रभाव सिख, मुस्लिम, हिंदू तीनों धर्मों में देखा जाता है। उनके बारे में सारी जानकारी इस लेख के माध्यम से प्रदान की गई है। आप नीचे दिए गए अनुभाग में पढ़ सकते हैं।

जीवन परिचय बिंदुजीवन परिचय
नाम (Name)कबीरदास
उपनाम (Surname)कबीरदास, कबीर परमेश्वर, कबीर साहेब
पिता का नाम (Father Name)नीरू जुलाहे
माता का नाम (Mother Name)नीमा
जन्म दिनांक (Birth Date)1440 ईस्वी
जन्म स्थान (Birth Place)काशी
बच्चो के नाम (Children’s Names)कमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री)
मृत्यु दिनांक (Death)1518 ईस्वी
मृत्यु स्थान (Death Place)मगहर, उत्तर प्रदेश

कबीर दास का जीवन (कबीर दास का जीवन परिचय) – Kabir Das Ka Jivan Parichay

कबीर दास जी का जीवन परिचय – ( Kabir Das Ji Ka Jivan Parichay in Hindi)

कबीर दास जी के जन्म के विषय में विद्वानों का मत है कि कबीर दास जी का जन्म नहीं हुआ था। उतरे थे। वे हर युग में अपने सतलोक से पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। कबीर दास जी लहरतारा के तालाब में कमल के फूल पर उनके माता-पिता नीरू जुलाहे, जिन्हें नाम से पुकारा जाता था, और नीमा से मिले थे। 

पहली पूर्णिमा (1398 (संवत 1455) की भोर में, कबीर दास जी नीरू और नीमा से मिले। यह वे थे जिन्होंने उनका अनुसरण किया। परिवार बहुत गरीब और अनपढ़ था। और उन्होंने अपना जीवन यापन किया। उन्होंने कबीर दास को पाला है। जी अपने ही बच्चे की तरह।

कबीर दास के शिक्षक

कबीर दास जी जिस परिवार में रहते थे, वह बेहद गरीब परिवार था। और दिन में दो वक्त का खाना मिलना उनके लिए बड़ी बात थी। इसलिए शिक्षा के बारे में सोचना तो दूर की बात है। कबीर दास जी कभी बड़े नहीं हुए। लेकिन कबीर दास जी को पहले से ही हर तरह का ज्ञान था। काशी के प्रसिद्ध विद्वान रामानंदजी के आश्रम में उन्होंने अध्ययन करने का बहुत प्रयास किया।

लेकिन वे सफल नहीं हुए। उनकी गरीबी उनके लिए हर जगह बाधा खड़ी कर रही थी। और उनके समय में जाति बहुत ऊँची और नीची थी। ब्राह्मणों का दबदबा था। कबीर दास जी ने देखा कि आचार्य रामानंद प्रात:काल सभी आवश्यक कार्यों के लिए घाट पर अवश्य जाते हैं। तो कबीर दास जी ने नदी के घाटों पर चार और बाड़ लगा दी थी।

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कबीर दास धर्म और समाज

कबीर दास जी के लिए कोई धर्म सर्वोपरि नहीं था। उनके लिए सभी धर्म समान थे। इस वजह से उन्हें कई बार मुसलमानों और हिंदू लोगों की उपेक्षा का सामना करना पड़ा। उनका लक्ष्य समाज में उच्च और निम्न, जाति और पंथ की सामाजिक बुराइयों को दूर करना था। और लोगों को सच्चाई के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करना था। उनके उपदेश हमेशा लोगों को इन सभी बुराइयों से दूर रहने की शिक्षा देते हैं।

कबीर दास जी की रचनाएं – 

अगाध मंगल | अठपहरा | अनुराग सागर | अमर मूल | अर्जनाम कबीर का | अलिफ़ नामा | अक्षर खंड की रमैनी | अक्षर भेद की रमैनी | आरती कबीर कृत | उग्र गीता | उग्र ज्ञान मूल सिद्धांत- दश भाषा | कबीर और धर्मंदास की गोष्ठी | कबीर की वाणी | कबीर अष्टक कबीर | गोरख की गोष्ठी

कबीर दास के दोहे (Kabir Das ke dohe)

“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय.”

इंसान दुसरो के अंदर बुराई ढूंढ़ता है। कबीर जी ने कहा है की जब मैंने संसार में बुराई को ढूंढ़ने का प्रयास किया तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला। फिर मैंने अपने अंदर बुराई को ढूंढा तो मुझसे बुरा कोई नहीं मिला। क्योकि में खुद अंदर से बुरा हु तो सामने वाले के अंदर तो मुझे बुराई तो नजर आएगी ही। इसलिए दूसरे के अंदर झाकने से पहले अपने अंदर झांक कर देख लेना चाहिए की हम कितने सही है।

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कबीर के दोहे

“क्या मांगुँ कुछ थिर ना रहाई, देखत नैन चला जग जाई। एक लख पूत सवा लख नाती, उस रावण कै दीवा न बाती।”

मनुष्य में लालच बहुत है। वो अपनी वंश को हमेशा बनाये रखना चाहता है। लेकिन हे मानव जिस प्रकार रावण का इतना बड़ा परिवार नहीं रहा तो तुम तो एक तुछ प्राणी हो। जो इस धरती पर स्थाई नहीं है। उसके पीछे क्यों भाग रहा है। प्रभु की भक्ति के पीछे भागने की बजाय मोह माया में उलझा हुआ है।

Kabir ke dohe

“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान ।।”

कबीर जी ने हिन्दुओ पर कटाक्ष करते हुए दोहे के माध्यम से कहा है की जाति पाती में कुछ नहीं है। किसी भी व्यक्ति की जाति नहीं पूछनी चाहिए। क्योकि वैल्यू जाति की नहीं उसके कर्मो की होती है। उसके व्यक्त्तिव की होती है। उसके सवभाव की होती है। जिस प्रकार तलवार की कीमत होती है। लेकिन उसके म्यान की कोई कीमत नहीं होती।

“पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात । एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात ।।”

इस दोहे के माध्यम से Kabir Das जी ने कहा है की हे मानव क्यों इस भौतिक शरीर पर घमंड करना। ये शरीर एक क्षणभंगुर मात्र है। ये कुछ ही क्षण में नष्ट हो जायेगा। लेकिन आत्मा अमर है। आपके कर्म अमर है। इसलिए शरीर पर नहीं अपने कर्मो पर ध्यान देना जरुरी है।

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Kabir ke dohe in Hindi

“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय.”

संत कबीर दास जी के अनुसार इस दुनिया में कर्म का फल धीरे धीरे मिलता है। हर कार्य का परिणाम तुरंत नहीं मिलता ह। जिस प्रकार एक पौधा बड़ा होने में समय लेता है। उसी प्रकार प्रकार उसकी देख रेख करनी पड़ती है । तभी आगे जाकर आपको उससे फल फूल मिलते है। उसी प्रकार जीवन में हर कार्य को सही रूप से करना होता है। तभी उसका परिणाम आपको भविष्य में अच्छा मिलेगा। कबीर दास जी ने इस दोहे के मदद से इंसान को धैर्यवान बनने की सिख दी है। इंसान को धैर्यवान होना जरुरी है। इसलिए कर्म कीजिये और सही तरीके से कीजिये और परिणाम भविष्य पर छोड़ दीजिये। क्योकि आपके कर्म सही होंगे तो इसके परिणाम भी सुखद होंगे।

“जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।”

कबीर दास जी के इस दोहे के माध्यम से ये कहना है की जो व्यक्ति कोशिश करता है। वो हमेशा ही कुछ न कुछ हासिल जरूर करता है। लेकिन बिना कोशिश करने वाले हमेशा ही खाली हाथ ही रहते है। जैसे नदी के किनारे गोता लगाने वाला गोताखोर नहीं के अंदर से कुछ न कुछ लेकर ही आता है। लेकिन किनारे पर डूबने के डर से बैठे व्यत्कि को कुछ भी नही मिलता ह। इसलिए लाइफ में कोशिश जरूर करनी चाहिए। चाहे इसका परिणाम कुछ भी हो।

“कबीर, पत्थर पूजें हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार। तातें तो चक्की भली, पीस खाये संसार।।”

Kabir Das ने इस दोहे की मदद से हिन्दुओ को समझाया है की मूर्ति पूजा में कुछ नहीं रखा है। अगर प्रभु को मूर्ति में ही मिलना होता तो आज सभी लोग उनके दर्शन कर लेते। ये सिर्फ धार्मिक आबंडर है। अगर पूजा ही करनी है तो आटा पीसने वाली चक्की की कीजिये वो कम से कम आपके लिए आटा तो पीस कर देती है। और हमें भोजन खाने के लिए मिलता है। मूर्ति पूजा से क्या मिलता है। मनुष्य के लिए सबसे बड़ा भगवान उसके अंदर है। हर इंसान की मदद करना ऊंच नीच को छोड़ना , सही कार्य करना ही इंसान के लिए सही है।

“बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि, हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि.”

इंसान के पास भगवान् से सबसे बड़ा हथियार दिया है। और बहुत से नासमझ इंसान इसका प्रयोग सही से करना नहीं जानते। भगवान् ने इंसान को बोली थी है। और ये एक ऐसा हथियार है जिससे हर कार्य पूरा किया जा सकता है। इंसान के बोल ही उसको समाज में स्थान दिलाते है। जिस प्रकार के शब्द इंसान प्रयोग करता है। उसी प्रकार का वातावरण उसके आसपास होता है।

और उसी आधार पर इंसान का व्यक्तित्व देखा जाता है। इसलिए शब्द को सोच समझ कर बोलना चाहिए। क्योकि तीर से निकला बाण वापस नहीं आता उसी प्रकार से जबान से निकला शब्द कभी भी वापस नहीं आता। और तीर से लगा घाव भर सकता है लेकिन शब्द से लगा घाव कभी नहीं भर सकता। इसलिए सब्दो में मिठास होना बहुत ही जरुरी है। और इनका प्रयोग बड़ी समझदारी से करना चाहिए।

Kabir das ji ke dohe

“तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय .  कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥”

जीवन में कभी भी किसी भी इंसान को कमजोर या कम नहीं आंकना चाहिए। क्योकि अगर एक छोटा सा तिनका भी आँख में चला जाता है तो आपकी आँख के लिए वो बड़ा खतरा बन सकता है। इसलिए कमजोर व्यक्ति भी एक दिन आपके लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकता है। इसलिए हमेशा ही सामने वाले को अपने बराबर समझना चाहिए क्योकि परिसिथतियों को बदलने में समय नहीं लगता है। और कमजोर व्यक्ति कई बार ऐसी मार कर देता है। की सामने बलशाली व्यक्ति की हालत ख़राब हो जाति है।

“गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय,  बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥”

कबीर दास जी के इस दोहे में कबीर दास जी ने कहा है की आपको जब लगने लगे की आपके सामने ईश्वर और गुरु है और आपको किसको पहले अभिवादन करना चाहिए तो गुरु का दर्जा पहले आता है। क्योकि गुरु की वजह से ही आपको ईश्वर ज्ञान की प्राप्ति हुई है। और जीवन में माता पिता से बड़ा गुरु कोई नहीं होता है। ईश्वर ने आपको बनाया है लेकिन आपको ईश्वर के बारे में जानकारी आपके गुरु ने दी है इसलिए गुरु महान होता है। अभिवादन भी गुरु का ही करना चाहिए। आपके गुरु के कारन ही आज आप इस लायक है की ईश्वर के सामने खड़े है।

कबीर दास जी के दोहे – Kabir Das Ka Jivan Parichay

“साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय, मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥”

कबीर दास जी ने प्रभु से विनती की है की हे प्रभु हम पर इतनी कृपा बना कर रखना की मेरा परिवार कभी भी भूखा न रहे। हमेशा सुखी रहे। और इसके आलावा हमें कुछ नहीं चाहिए। किसी भी इंसान को दुःख ना हो। संसार में हर इंसान को समय पर खाना और सुविधाएं मिलती रहे। ताकि उनका जीवन कष्टमय ना हो।

“काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परलय होएगी, बहुरी करोगे कब”

कबीर दास जी कहते है की आज का काम आज ही करना उचित होता है कल पर नहीं टालना चाहिए। कल पर काम टालने से कल का पता नहीं है की कल क्या हो। हो सकता है कल आप रहे ही न या फिर कल कोई परलय आ जाये और आपके काम अधूरे रह जाये। इसलिए आज का काम आज ही खत्म करना चाहिए। कल पर काम छोड़ने वाले मानव कभी अपने जीवन में सफल नहीं होते है।

“जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग, तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग” 

जिस प्रकार तिल में तेल होता है। और चकमक पत्थर में आग होती है लेकिन दिखाई नहीं देते है। उसी प्रकार हर इंसान के भीतर ईश्वर होते है लेकिन दिखाई नहीं देते। इसलिए हे इंसान अपने अंदर ईश्वर को खोजिये। बाहर खोजने पर आपको सिर्फ पाखंड और भ्रम ही मिलेगा। ईश्वर नहीं मिलेंगे। इसलिए अपने अंदर को टटोलिये।

कबीर के दोहे हिंदी में

“चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए, वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाए” 

चिंता और चिता में सिर्फ एक बिंदु का अंतर होता है। चिंता इंसान को मौत की और ले जाति है। इसलिए चिंता को छोड़ दीजिये और प्रभु पर विश्वास रखिये। चिंता और वहम की दवाई न तो डॉक्टर के पास होती है और न ही ईश्वर के पास। इसलिए अपने अंदर खुद को देखिये। इसका हल आपके अंदर ही छुपा होता है। चिंता करने से किसी भी समयसा का हल नहीं निकलता है।

“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर आशा, तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर”

इंसान मोह माया में फंसा हुआ है। उसकी इच्छाएं कभी पूरी नहीं होती। और कभी इनका अंत नहीं होता। मानव शरीर का अंत हो जाता है लेकिन उसकी इच्छाएं हमेशा जीवित रहती है। इसलिए जीवन में संतुस्ट रहिये। प्रभु की भक्ति में लीन रहिये आपका उद्दार हो जायेगा। मोह माया में कुछ नहीं रखा है। इच्छाएं सिर्फ भौतिक सुख को बढ़ावा देती है।

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कबीरदास जी की अन्य रचनाएं :

  • झीनी झीनी बीनी चदरिया
  • केहि समुझावौ सब जग अन्धा
  • तूने रात गँवायी सोय के दिवस गँवाया खाय के
  • मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में
  • रे दिल गाफिल गफलत मत कर
  • घूँघट के पट
  • गुरुदेव का अंग
  • सुमिरण का अंग
  • विरह का अंग
  • जर्णा का अंग
  • पतिव्रता का अंग
  • कामी का अंग
  • चांणक का अंग
  • रस का अंग
  • माया का अंग
  • कथनी-करणी का अंग
  • सांच का अंग
  • भ्रम-बिधोंसवा का अंग
  • साध-असाध का अंग
  • संगति का अंग
  • मन का अंग
  • चितावणी का अंग
  • भेष का अंग
  • साध का अंग
  • मधि का अंग
  • बेसास का अंग
  • सूरातन का अंग
  • जीवन-मृतक का अंग
  • सम्रथाई का अंग
  • उपदेश का अंग
  • कौन ठगवा नगरिया लूटल हो
  • मेरी चुनरी में परिगयो दाग पिया
  • अंखियां तो छाई परी
  • माया महा ठगनी हम जानी
  • सुपने में सांइ मिले
  • मोको कहां ढूँढे रे बन्दे
  • अवधूता युगन युगन हम योगी
  • साधो ये मुरदों का गांव
  • मन ना रँगाए, रँगाए जोगी कपड़ा
  • निरंजन धन तुम्हरा दरबार
  • ऋतु फागुन नियरानी हो
  • साधो, देखो जग बौराना
  • सहज मिले अविनासी
  • काहे री नलिनी तू कुमिलानी
  • मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै
  • रहना नहिं देस बिराना है
  • कबीर की साखियाँ
  • हमन है इश्क मस्ताना
  • कबीर के पद
  • नीति के दोहे
  • मोको कहां
  • तेरा मेरा मनुवां
  • बहुरि नहिं आवना या देस
  • बीत गये दिन भजन बिना रे
  • नैया पड़ी मंझधार गुरु बिन कैसे लागे पार
  • राम बिनु तन को ताप न जाई
  • करम गति टारै नाहिं टरी
  • भजो रे भैया राम गोविंद हरी
  • दिवाने मन, भजन बिना दुख पैहौ

कबीर दास की मृत्यु

सन् 1518 ई. में मगहर में संत कबीर दास जी की मृत्यु हो गई। कबीर जी की मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों के बीच बहस छिड़ गई। क्योंकि उनके अनुयायी मुसलमान थे, दो धर्मों के हिंदू। 

इसलिए मुसलमान उसका अंतिम संस्कार अपने रीति-रिवाजों से करना चाहते थे। और हिंदू इसे अपने रीति-रिवाजों के अनुसार करना चाहते थे। इसके बाद दोनों धर्मों के लोगों ने उनके शरीर के पास पड़े फूलों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया। संत कबीर दास जी पूरे विश्व में प्रसिद्ध थे और वे कर्म प्रधान थे।

वे कर्म में विश्वास करते थे। इसलिए वे किसी धर्म को नहीं मानते थे। साथ ही लोगों को समाज में फैली ऐसी सामाजिक बुराइयों से दूर रहने की सलाह भी दी गई है। कबीर दास जी ने भक्ति आंदोलन भी चलाया था। 

इस आंदोलन के माध्यम से लोगों के बीच भाईचारे को बढ़ावा देने का काम किया था। और कबीर जी के अनुयायी के पंथ को कबीर पंथ के नाम से जाना जाता है। और यह पूरा भारत पूरे भारत में फैला हुआ है।

इस ट्यूटोरियल में, हमने आपको “कबीर दास जी का जीवन परिचय हिंदी में (Biography of Sant Kabeer Das in Hindi)” के बारे में पूरी जानकारी दी है। यह ट्यूटोरियल आपके लिए उपयोगी होगा। आपको यह जानकारी कैसी लगी कमेंट कर के जरूर बताइये और अपने सुझाव को हमारे साथ शेयर करें ।

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